इस मामले में कई याचिकाकर्ता रहे, लेकिन पहले याचिकाकर्ता रहे जस्टिस केएस पुट्टास्वामी.
आने वाली पीढ़ियां आधार के मामले को क़ाग़ज़ों पर केएस पुट्टास्वामी बनाम भारतीय संघ के रूप में याद रखेंगी.
जस्टिस पुट्टास्वामी 92 वर्ष के हैं और हर सवाल का सावधानी से जवाब देते हैं.
टेलीविज़न पर उन्होंने फ़ैसले के जो हिस्से देखे-सुने हैं, उस आधार पर वह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का बहुमत फ़ैसला 'निष्पक्ष और जायज़' लगता है.
जस्टिस पुट्टास्वामी कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व जज हैं और आंध्र प्रदेश के पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य हैं.
वह आधार के साथ-साथ निजता के अधिकार मामले के भी पहले याचिकाकर्ता हैं. निजता के अधिकार मामले में शीर्ष अदालत ने निजता को मौलिक अधिकार माना था.
2012 में जब आधार मामले पर केंद्र सरकार के कार्यकारी आदेश के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दाख़िल करने का फ़ैसला किया, तब उन्हें अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि वह भारत के न्यायिक इतिहास के दो महत्वपूर्ण फ़ैसलों का हिस्सा बनेंगे.
बुधवार को जब आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया तो रिपोर्टर जस्टिस पुट्टास्वामी की प्रतिक्रिया लेने पहुंच गए. जस्टिस पुट्टास्वामी अपनी चिर परिचित सादगी के साथ उनसे मिले.
कर्नाटक हाईकोर्ट में उनके साथ रहे जस्टिस रामा जोइस कहते हैं, "जस्टिस पुट्टास्वामी बेशक एक बहुत विनम्र इंसान है. वो हमेशा से ऐसे रहे हैं."
जस्टिस जोइस पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे हैं. वह बिहार और झारखंड के राज्यपाल और भाजपा से राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं.
जस्टिस पुट्टास्वामी ने सरकारी आदेश की चर्चा सबसे पहले जस्टिस जोइस से की थी और उसी के बाद जनहित याचिका दाख़िल करने का फैसला किया था.
उनके बेटे बीपी श्रीनिवास के मुताबिक, " 2010 में उनके कुछ दोस्त दिल्ली से आए थे और चाय पर उनसे बातचीत चल रही थी. तभी इस बारे में बातचीत हुई कि सरकार एक एग्ज़ीक्यूटिव आदेश जारी करके नागरिकों के फिंगर प्रिंट नहीं ले सकती."
जस्टिस जोइस ने बताया, "उन्होंने चर्चा की कि किन आधारों पर जनहित याचिका दाख़िल की जा सकती है. उन्होंने बस याचिका दाख़िल कर दी लेकिन जिरह के लिए कभी अदालत नहीं गए. दूसरे वक़ीलों ने जिरह की."
इन वकीलों में सबसे पहले थे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यन.
जस्टिस पुट्टास्वामी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "जब मैंने याचिका डाली तब वह एक एग्ज़ीक्यूटिव आदेश था. आधार एक्ट उसके बाद आया. और अब कोर्ट ने इस एक्ट के दो सेक्शन हटा दिए हैं जो संविधान के अनुच्छेद 19 के ख़िलाफ़ थे."
"मेरा मत ये है कि आधार एक्ट अपराधियों की धर-पकड़ के लिए तो ठीक है, लेकिन मेरे और आपके जैसे आम नागरिकों के लिए यह उपयोगी नहीं है."
इस फैसले पर विस्तार से राय मांगे जाने पर उन्होंने कहा, "मैं बिना पूरा फ़ैसला पढ़े अपनी राय नहीं बना सकता."
एक टूटी हुई नाव में अनजान समंदर के
बीचों-बीच 49 दिनों तक रहना. वो भी बिना खाना और पानी के. क्या ये आपको
'लाइफ़ ऑफ़ पाई' या किसी ऐसी ही फ़िल्म की याद दिलाता है?
ये किसी फ़िल्म की नहीं बल्कि असली कहानी है.18 साल के आल्दी नोवेल आदिलांग जुलाई महीने में इंडोनेशियाई समुद्र तट से तक़रीबन 125 किलोमीटर की दूरी पर एक 'फ़िशिंग हट' यानी मछली पकड़ने के लिए बनी झोपड़ीनुमा नाव में थे. इसी समय अचानक तेज़ हवाएं चलने लगीं और नाव का लंगर टूट गया.तीजा, आल्दी की फ़िशिंग हट बेकाबू हो गई और हज़ारों किलोमीटर दूर गुआम के पास जाकर रुकी. हालात ऐसे थे कि आल्दी का ज़िंदा बचना मुश्किल था लेकिन ख़ुशकिस्मती से पनामा के एक जहाज़ ने उन्हें 49 दिनों बाद सुरक्षित बचा लिया.
इंडोनेशियाई के सुलावेसी द्वीप समूह के रहने वाले आल्दी एक 'रोम्पॉन्ग' पर काम करते थे. रोम्पॉन्ग मछली पकड़ने वाली एक नाव होती है जो बिना किसी पैडल या इंजन के चलती है.
इंडोनेशिया के 'जकार्ता पोस्ट' अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, आल्दी का काम नाव पर उस ख़ास लैंपों को जलाना और उनकी देखरेख करना था जिसकी वजह से मछलियां नाव की तरफ़ आकर्षित होती हैं.
मछली पकड़ने के लिए बनाए इस झोपड़ीनुमा नाव को समंदर में रस्सियों के सहारे चलाया जाता है. जुलाई को जब तेज़ हवाओं की वजह से आल्दी की नाव बेकाबू हुई, उनके पास बहुत कम खाना बचा था. ऐसी स्थिति में उन्होंने हिम्मत और सूझबूझ से काम लिया. आल्दी ने मछलियां पकड़ीं और नाव पर बने लकड़ियों के बाड़ जलाकर उन्हें पकाया.
अभी ये पता नहीं चला है कि आल्दी ने पानी का इंतज़ाम कहां से किया.
जापान में मौजूद इंडोनेशिया के राजनायिक फजर फ़िरदौस ने 'द जकार्ता पोस्ट' को दिए इंटरव्यू में बताया कि इन 49 दिनों में आल्दी बुरी तरह डरे रहते थे और वो अक्सर रोया करते थे.
फजर फ़िरदौस के मुताबिक़, "आल्दी को जब भी कोई बड़ा जहाज़ दिखता, उनके मन में एक उम्मीद जग जाती. 10 से ज़्यादा जहाज़ उनके रास्ते से गुज़रे लेकिन न तो किसी की नज़र उन पर पड़ी और न ही कोई जहाज़ रुका."
आल्दी की मां ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि उन्हें अपने बेटे के ग़ायब होने का पता कैसे चला.
उन्होंने कहा, "आल्दी के बॉस ने मेरे पति को बताया कि वो लापता हो गया है. इसके बाद हमने सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया और उसकी सलामती के लिए लगातार दुआएं मांगते रहे." गस्त को आल्दी ने अपने पास एक पनामा का एक जहाज़ देखा और आपातकालीन रेडियो सिग्नल भेजा.
इसके बाद जहाज़ के कैप्टन ने गुआम के कोस्टगार्ड से संपर्क किया. कोस्टगार्ड ने जहाज़ के क्रू को निर्देश दिया कि वो आल्दी के अपने गंतव्य तक यानी जापान लेकर जाएं.
आल्दी 6 सितंबर को जापान पहुंचे और दो दिन बाद उन्होंने इंडोनेशिया के लिए उड़ान भरी. इसके बाद आख़िरकार वो अपने परिवार से मिला. बताया जा रहा है उनकी सेहत अच्छी है.
आल्दी की मां ने कहा, "अब वो वापस आ गया है. 30 सितंबर को उसका जन्मदिन है, वो 19 साल का हो जाएगा. हम जश्न की तैयारी में हैं."
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